वाराणसी , संवाददाता : शारदीय नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ‘देवी ब्रह्मचारिणी’ रूप की पूजा करने का विधान है, जो कोतवाली थाना अंतर्गत दुर्गा घाट पर मां गंगा के तट पर विराजमान हैं। मंगलवार को भारी संख्या में श्रद्धालु मां के दर्शन- पूजन के लिए पहुंचे। माता के जयकारे से पूरा परिसर गूंज उठा। मां का दर्शन करने के लिए भोर से ही भक्तों की कतार लग गई। श्रद्धालु नारियल, माला फूल और खीर प्रसाद जो मां को अत्यंत प्रिय है, लेकर मां का दर्शन करने के लिए भोर से ही लाइन में लगे रहे। महंत राजेश्वर सागरकर ने बताया कि भोर में 3 बजे मंदिर खोल कर मां के विग्रह का पंचामृत से स्नान कराया गया। इसके बाद मंगला दर्शन के लिए भक्तों के लिए कपाट खोल दिया गया और मां को श्रीसूत्र मंत्रउच्चारण सुना कर षोडशोचार विधि से पूजन अर्चन किया गया। सुबह से दर्शन के लिए कतार में खड़े रहे श्रद्धालु महंत ने बताया कि माता का सबसे प्रिय भोग खीर है और खीर से हवन करने पर अत्यंत सुख मिलता है और भक्तों का हर दुख दूर होता है। धन वैभव से संपन्न होता है। इसके एक घंटे बाद आरती की जाती है। उसके बाद पूरे दिन मंदिर में भक्तों की लाइन लगी रहती है। मां के दर्शन के लिए पूरे दिन श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी रही। दक्षिणी विधायक नीलकंठ तिवारी ने भी लाइन में लगकर विधिवत पूजा-अर्चना की। क्या है मान्यतादुर्गा घाट पर विराजमान मां ब्रह्मचारिणी के दाएं हाथ में माला और बाएं हाथ में कमण्डल है। शास्त्रों में बताया गया है कि मां दुर्गा ने पार्वती के रूप में पर्वतराज के यहां पुत्री बनकर जन्म लिया और महर्षि नारद के कहने पर अपने जीवन में भगवान महादेव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। हजारों वर्षों तक अपनी कठिन तपस्या के कारण ही इनका नाम तपश्चारिणी या ब्रह्मचारिणी पड़ा। उन्हें त्याग और तपस्या की देवी माना जाता है। अपनी इस तपस्या की अवधि में इन्होंने कई वर्षों तक निराहार रहकर और अत्यन्त कठिन तप से महादेव को प्रसन्न कर लिया। इनके इसी रूप की पूजा और स्तवन दूसरे नवरात्र पर किया जाता है। क्या कहते हैं मंदिर के सेवादारमंदिर के सेवादार के अनुसार देवी ब्रह्मचारिणी भगवती दुर्गा की नव शक्तियों में इनका दूसरा रूप माना जाता है। शास्त्रों में ऐसा उल्लेख है कि माता ब्रह्मचारिणी पूर्व जन्म में राजा हिमालय के घर मैना के गर्भ से उत्पन्न हुईं। देवर्षि नारद के कहने पर माता ब्रम्हचारिणी शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए जंगल में जाकर हजारों वर्ष केवल फल खाकर कठिन तपस्या कीं। पुनः शिव को विशेष प्रसन्न करने के लिए ब्रह्मचारिणी ने 3000 वर्ष तक वृक्षों से गिरे सूखे पत्तों को खाकर कठिन तपस्या कीं। Post navigation UP : मंगलवार रहा मानसून सीजन का दूसरा सबसे गर्म दिन Agra :120 करोड़ की सरकारी भूमि, बुलडोजर ने ध्वस्त कर डालीं