पेट्रोल पंप से डिलीवरी तक, ये महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भरता की मिसाल

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आगरा, संवाददाता :आगरा की महिलाएं कठिन परिस्थितियों और आर्थिक तंगी के बावजूद पेट्रोल पंप, डिलीवरी और मजदूरी जैसे काम कर आत्मनिर्भर बन रही हैं। इन कहानियों में संघर्ष के साथ-साथ मजबूत इरादों और परिवार की जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा झलकती है।

कहते हैं कि हौसले बुलंद हों तो शारीरिक अक्षमता और आर्थिक तंगी भी रास्ता नहीं रोक सकती। क्षेत्र की महिलाओं ने इस बात को सच कर दिखाया है। घर की दहलीज लांघकर आज ये महिलाएं पेट्रोल पंप से लेकर फूड डिलीवरी तक के मोर्चे पर डटी हैं। किसी के सिर पर बीमार मां की जिम्मेदारी है, तो कोई पति का हाथ बंटाने के लिए डिलीवरी पार्टनर बनी है।

मां का एक्सीडेंट हुआ तो दीक्षा ने संभाला मोर्चा
शास्त्रीपुरम की रहने वाली दीक्षा आज कारगिल पेट्रोल पंप पर मुस्तैदी से तैनात हैं। दीक्षा बताती हैं कि उनकी मां दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा कर घर चलाती थीं, लेकिन एक भीषण सड़क हादसे ने मां को बिस्तर पर ला दिया। घर का खर्च और छोटे भाई की पढ़ाई का जिम्मा अचानक दीक्षा के कंधों पर आ गया। दीक्षा ने हार मानने के बजाय पेट्रोल पंप पर सेल्स वुमन की नौकरी चुनी। वे कहती हैं, “काम कोई छोटा नहीं होता, बस इरादे नेक होने चाहिए।”

दिव्यांगता नहीं बनी बाधा, समीना अब बांट रही हैं खुशियां

राधा बिहार कॉलोनी की समीना की कहानी उन लोगों के लिए मिसाल है जो शारीरिक कमी को कमजोरी मान लेते हैं। समीना बताती हैं कि दिव्यांग होने के कारण उन्हें कोई काम देने को तैयार नहीं था। पति असगर ऑटो चलाकर अकेले घर का बोझ नहीं उठा पा रहे थे। ऐसे में जोमैटो और इंडियन ऑयल की पहल ने उन्हें नई जिंदगी दी। समीना आज फूड डिलीवरी का काम कर न केवल अपने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित कर रही हैं, बल्कि समाज की रूढ़ियों को भी तोड़ रही हैं।

आवास बिचपुरी की निवासी लाडो के लिए उनका काम केवल मजदूरी नहीं, बल्कि बच्चों के सुनहरे भविष्य का निवेश है। वे पुरुषों के साथ सुबह से मजदूरी करती है। लाडो का कहना है कि पति संजू का हाथ बंटाने और बढ़ती महंगाई में बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए उन्होंने यह कदम उठाया। दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद जब वे घर लौटती हैं, तो उनके चेहरे पर अपने बच्चों को बेहतर जीवन देने का संतोष होता है

लंगड़े की चौकी निवासी प्रमिला साहस और संघर्ष की जीवंत मिसाल बन गई हैं। आर्थिक तंगी से जूझते हुए प्रमिला पिछले 15 वर्षों से दूसरों के घरों में झाड़ू-पोछा कर अपने पांच बच्चों का भविष्य संवार रही हैं। प्रमिला ने बताया कि पति की मजदूरी से घर का खर्च चलाना मुश्किल था। बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाने और परिवार के तानों से ऊपर उठकर उन्होंने काम करने का फैसला किया। तंगी और चुनौतियों के बावजूद उनका लक्ष्य बच्चों को शिक्षित कर आत्मनिर्भर बनाना है।
 

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