नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : एसआईआर प्रक्रिया को लेकर विपक्षी दलों की आलोचनाओं का सामना कर रहे चुनाव आयोग के लिए बुधवार बड़ी जीत का दिन रहा। सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण (एसआईआर) को वैध ठहराया और कहा कि चुनाव आयोग को इसका अधिकार है।
यह प्रक्रिया निष्पक्ष चुनावों के संवैधानिक जनादेश में जान डालती है। एसआईआर की प्रक्रिया निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों के संवैधानिक लक्ष्य को आगे बढ़ाती है, जो लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ
शीर्ष अदात ने कहा कि प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ और चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम शामिल करने की पात्रता के लिहाज से नागरिकता की जांच करने का सीमित अधिकार है। लेकिन ऐसी जांच कड़े अर्थों में नागरिकता का निर्धारण नहीं मानी जाती।
मतदाता सूची से नाम हटाए जाने का अर्थ इस बात की कानूनी घोषणा नहीं है कि कोई व्यक्ति नागरिक नहीं है। मतदाता सूची में नाम होने से नागरिकता का अनुमान लगाया जाता है, लेकिन सही और उचित जांच के जरिये इस अनुमान को गलत साबित किया जा सकता है।
एसआईआर की वैधता पर मुहर लगाने वाला यह फैसला महत्वपूर्ण है क्योंकि विपक्षी दल लगातार बिहार और बंगाल के विधानसभा चुनाव में एसआइआर प्रक्रिया पर सवाल उठाकर इसकी आड़ में बड़ी संख्या में लोगों को मतदाता सूची से बाहर करने का आरोप लगा रहे थे।
एसआईआर पूरे देश में होनी है
एसआईआर पूरे देश में होनी है। बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश सहित 13 राज्यों में हो चुकी है और बाकी राज्यों में अभी होनी है। इस फैसले से लगता है कि एसआइआर की वैधता पर उठ रहे सवालों का पटाक्षेप हो जाएगा।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने बिहार में एसआइआर प्रक्रिया की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का निपटारा करते हुए 124 पृष्ठ का विस्तृत फैसला सुनाया।
कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद-324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21(3) के तहत एसआइआर कराने का अधिकार है। जनप्रतिनिधित्व कानून के वैधानिक ढांचे में भी प्रविधान है, जिसकी धारा 21(3) के तहत आयोग विशेष पुनरीक्षण का निर्देश दे सकता है।
एसआईआर के तहत नाम हटाने को, 1960 के नियम-21ए के तहत निर्धारित प्रक्रिया के विरुद्ध नहीं कहा जा सकता। नोटिस और सुनवाई के सुरक्षा उपाय सुरक्षित हैं। एसआइआर की प्रक्रिया जिस तरह संचालित की गई है, वह आनुपातिकता की आवश्यकताओं को पूरा करती है।
कोर्ट ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया वैध और संवैधानिक आधार पर थी
कोर्ट ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया वैध और संवैधानिक आधार पर थी, जिसका अर्थ है मतदाता सूचियों की सटीकता, पूर्णता और अखंडता को बहाल रखना।
पीठ ने फैसले में कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता मतदाता सूची की सटीकता पर निर्भर है, अदालत यह मानने में असमर्थ है कि प्रक्रिया सिर्फ प्रशासनिक सुविधा के लिए अपनाई गई है।
कोर्ट ने कहा कि निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की प्रक्रिया पर निर्भर नहीं करते, बल्कि वे मूल रूप से मतदाता सूचियों की सत्यता, सटीकता और शुद्धता पर निर्भर करते हैं।
कोर्ट ने चुनाव आयोग के अपनी वैधानिक शक्तियों के उल्लंघन करने के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि पहले चरण में चुनाव आयोग ने बिहार में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू की, जहां पिछले चार दशकों से तीव्र शहरीकरण और बड़े पैमाने पर प्रवासन के आधार पर मतदाता सूचियों से 65 लाख नाम हटा दिए।
आयोग के दस्तावेज सही
कोर्ट ने एसआइआर प्रक्रिया में चुनाव आयोग द्वारा जांच के लिए रखे गए दस्तावेजों को सही ठहराया। कहा कि दस्तावेज एक ऐसे सुसंगत मापदंड पर आधारित हैं जिसका सीधा संबंध मतदाता सूची की सत्यनिष्ठा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से है। कोर्ट ने कहा कि वह यह मानने में असमर्थ है कि दस्तावेजों का निर्धारण मनमाना है या वैधानिक योजना का उल्लंघन करता है।
जिनके नाम कटे हैं उनके मामले चार हफ्ते में सक्षम अथॉरिटी को भेजें
वोट देने के अधिकार से वंचित होने से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि नागरिकता के आधार पर जिन लोगों के नाम 2003 की वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन सभी मामलों को चार सप्ताह के भीतर नागरिकता कानून के तहत सक्षम अधिकारी को भेजा जाए।
सक्षम अधिकारी अगले संसदीय, विधानसभा या स्थानीय निकाय चुनाव से पहले नागरिकता तय करने का काम पूरा कर लेंगे। अगर सक्षम अधिकारी किसी व्यक्ति की नागरिकता की पुष्टि कर देते हैं तो उसका नाम तुरंत मतदाता सूची में जोड़ दिया जाना चाहिए।
इसके अलावा वे सभी व्यक्ति जो बिहार के निवासी हैं और जिनके नाम गलती से इस आधार पर हटा दिए गए हैं कि वे अनुपस्थित हैं, मृत हैं, कहीं और चले गए हैं या उनके नाम की पुनरावृति हुई है, वे न्यायिक समीक्षा के माध्यम से आयोग के इस निर्णय को चुनौती दे सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने चार प्रश्नों पर किया विचार
1. क्या चुनाव आयोग के पास एसआइआर कराने की शक्ति है।
2. क्या एसआइआर वैध उद्देश्य पर आधारित है और क्या चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया उस उद्देश्य के अनुपात में है जिसे प्राप्त करने का प्रयास किया जा रहा है।
3. क्या एसआइआर में आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व कानून और मतदाताओं के पंजीकरण नियम, 1960 के प्रविधानों का उल्लंघन करती है।
4. क्या चुनाव आयोग उन लोगों की नागरिकता की जांच कर सकता है जो मतदाता सूची में बने रहने या शामिल होने का अनुरोध कर रहे हैं।
लोकतंत्र की कहानी केवल वोट देने की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की पहचान करने की भी कहानी है, जिन्हें सरकार चुनने की प्रक्रिया में भाग लेने का अधिकार है। मतदाता सूची उस राजनीतिक समुदाय का कानूनी रिकॉर्ड होती है।- सुप्रीम कोर्ट
