लखनऊ, संवाददाता : शनि जयंती के संयोग से यह दिन शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या से परेशान लोगों के लिए भी लाभकारी रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि शनैश्चर अमावस्या और शनि जयंती पर शनि देव की पूजा से कष्टों में कमी आती है।
इस साल वट सावित्री व्रत का विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व है। यह व्रत शनिवार को दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों के अद्भुत संयोग में पड़ रहा है। इस दिन शनि जयंती, शनैश्चर अमावस्या, भरणी नक्षत्र, गजलक्ष्मी योग, बुधादित्य योग, सौभाग्य योग और शोभन योग का संगम बन रहा है।
ज्योतिषाचार्य मुकुंद बल्लभ भट्ट बताते हैं कि वट सावित्री व्रत सुहागिन महिलाओं के लिए अखंड सौभाग्य और पति की दीर्घायु का प्रतीक है। शनि जयंती के संयोग से यह दिन शनि दोष, साढ़े साती और ढैय्या से परेशान लोगों के लिए भी लाभकारी रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि शनैश्चर अमावस्या और शनि जयंती पर शनि देव की पूजा से कष्टों में कमी आती है। इस दिन तिल दान, पीपल और वट वृक्ष की पूजा तथा जरूरतमंदों को दान करना पुण्यदायी माना गया है। पूजा के लिए सुबह 07:12 बजे से 08:24 बजे तक का समय शुभ है। महिलाएं अभिजीत मुहूर्त में भी पूजा कर सकती हैं। व्रत का पारण 17 मई को सूर्योदय के बाद किया जाएगा।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, भरणी नक्षत्र में किया गया व्रत वैवाहिक जीवन में सुख, स्थिरता और समृद्धि देता है। गजलक्ष्मी योग धन-धान्य और पारिवारिक खुशहाली का प्रतीक माना गया है। सौभाग्य और शोभन योग महिलाओं के अखंड सौभाग्य में वृद्धि करते हैं। ये योग संतान सुख में भी बढ़ोतरी करने वाले माने जाते हैं।
वट सावित्री व्रत की पूजा विधि
– ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें
– लाल या पीले वस्त्र धारण करें
– वट वृक्ष के नीचे सावित्री, सत्यवान और यमराज का स्मरण करें
– वृक्ष पर जल, फूल और धूप-दीप अर्पित करें
– कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष की 7, 11 या 108 बार परिक्रमा करें
– पूजा के बाद वट सावित्री व्रत कथा सुनें
– पति की लंबी आयु की कामना करें
– परंपरा अनुसार, सास को बायना और प्रसाद भेंट करना भी शुभ है
