नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि जमानत की मांग करने वाले प्रत्येक आरोपित का यह दायित्व है कि वह जमानत संबंधी निर्णयों में एकरूपता, पारदर्शिता और निष्पक्षता को बढ़ावा देने के लिए हलफनामे के माध्यम से अपने पूर्व के अपराधों का उजागर करे। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि जमानत की मांग करने वाले आरोपित या आवेदक का यह दायित्व है कि वह न्यायिक विवेक के प्रयोग को सीधे प्रभावित करने वाले सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को निष्पक्ष और पूर्ण व स्पष्ट रूप से उजागर करे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाना, छिपाना या चुनिंदा रूप से प्रकट करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और आपराधिक न्याय प्रशासन की नींव पर प्रहार करता है। पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा कि जमानत आवेदनों में प्राथमिकी संख्या और तिथि, संबंधित पुलिस थाने का नाम, जांच एजेंसी द्वारा लगाई गई धाराएं और कथित अपराधों के लिए निर्धारित अधिकतम सजा आदि का उल्लेख होना चाहिए। अदालत ने कहा, ‘इस अदालत के रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया जाता है कि वह इस फैसले की एक प्रति सभी हाई कोर्टों के रजिस्ट्रार जनरल को भेजें। हाई कोर्ट अपने नियम बनाने की शक्तियों के अनुरूप उचित प्रशासनिक निर्देश जारी करने या अपने-अपने नियमों में उपयुक्त प्रविधान शामिल करने की व्यवहार्यता की जांच कर सकते हैं। मार्गदर्शन के लिए इस फैसले की एक प्रति जिला न्यायपालिका को भी भेजी जाए।’ ये निर्देश वकीलों को फर्जी डिग्री प्रमाणपत्र जारी करने के आरोपित को इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा दी गई जमानत को रद करते हुए दिए गए। Post navigation नौ करोड़ के लोन डिफॉल्ट केस में जेल में बंद राजपाल यादव को मिलेगी बेल या जेल ? IND vs NAM : बुमराह की गेंद से घायल हुआ भारतीय ओपनर