नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : ईरान युद्ध को शुरू हुए दो महीने से अधिक समय हो चुका है और दुनिया का सबसे अहम रणनीतिक समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य भी तब से ही प्रभावित है।
इस मार्ग से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल गुजरता है। सामान्य परिस्थितियों में रोजाना लगभग 140 जहाज इस रास्ते से दो करोड़ बैरल कच्चा तेल और पेट्रो उत्पाद लेकर गुजरते हैं। यही नहीं, वैश्विक जरूरत का लगभग 20 प्रतिशत लिक्विफायड नेचुरल गैस (एलएनजी) भी इसी मार्ग से सप्लाई होती है।
एक तिहाई यानी 33 प्रतिशत हीलियम और यूरिया जैसी अहम वस्तुओं की आपूर्ति भी यहीं से होती है। युद्धविराम के दौरान भी हालात युद्ध जैसे बने हुए हैं और ईरान के साथ-साथ अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के चलते इस मार्ग से एक भी जहाज नहीं गुजर पा रहा है।
होर्मुज पर कम होगी निर्भरता ?
होर्मुज पर निर्भरता कम करने के लिए विविधीकरण की योजनाएं दशकों से विचाराधीन रही हैं और अब इन वैकल्पिक उपायों की अभूतपूर्व परीक्षा हो रही है।
बाईपास इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाकारों की अपेक्षाओं के अनुरूप काम कर रहा है, जिससे प्रतिदिन लगभग 35 लाख से 55 लाख बैरल कच्चे तेल के परिवहन की क्षमता मिल रही है।
हालांकि, पाइपलाइन जैसे विकल्प केवल आंशिक समाधान ही साबित हो रहे हैं और होर्मुज की रणनीतिक महत्ता लंबे समय तक बनी रहेगी। ये विकल्प न केवल महंगे हैं, बल्कि इनके निर्माण में दशकों का समय लगता है और युद्ध जैसी स्थिति में इन पर हमले का खतरा भी बना रहता है।
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन
होर्मुज के विकल्प के तौर पर सऊदी अरब ने 1980 में ईरान-इराक युद्ध (टैंकर युद्ध) के दौरान ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जिसे पेट्रोलाइन भी कहा जाता है, का निर्माण शुरू किया। इस पाइपलाइन के जरिए रोजाना 70 लाख बैरल कच्चा तेल लाल सागर तट पर स्थित यान्बू बंदरगाह तक पहुंचाया जाता है, जहां से यूरोप को निर्यात होता है।
इसी दिशा में मिस्त्र की सुमेद पाइपलाइन भी है, जो रोजाना 25 लाख बैरल कच्चा तेल यूरोप भेजती है। युद्ध के चलते इसकी क्षमता 150 प्रतिशत तक बढ़ाई जा चुकी है।
यूएई की फुजैराह पाइपलाइन
संयुक्त अरब अमीरात ने अबू धाबी क्रूड आयल पाइपलाइन (एडकोप) के जरिए विकल्प तैयार किया है, जो हबशन से ओमान की खाड़ी स्थित फुजैराह बंदरगाह तक जाती है। इस पाइपलाइन की क्षमता रोजाना 20 लाख बैरल है और यह सीधे हिंद महासागर तक पहुंचने वाली एकमात्र पाइपलाइन है।
इराक की सीमित क्षमता
खाड़ी के अन्य बड़े उत्पादक देशों, खासकर इराक, के सामने संकट बना हुआ है। बसरा से रोजाना होने वाला 34 लाख बैरल तेल निर्यात लगभग ठप है। इराक की एकमात्र उत्तरी पाइपलाइन किरकुक तेल क्षेत्र को तुर्किये के सेयहान बंदरगाह से जोड़ती है, जिसकी क्षमता लगभग ढाई लाख बैरल प्रतिदिन है।
कुवैत और कतर की निर्भरता
कुवैत की स्थिति बेहद कमजोर है। युद्ध से पहले वह रोजाना 20 लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन करता था, लेकिन उसकी पूरी आपूर्ति होर्मुज पर निर्भर है और उसके पास कोई वैकल्पिक पाइपलाइन नहीं है।
कतर भी निर्यात के लिए पूरी तरह होर्मुज पर निर्भर है। वह रोजाना करीब छह लाख बैरल कच्चा तेल उत्पादन करता है, लेकिन उसकी असली ताकत गैस क्षेत्र में है। रास लाफान स्थित टर्मिनल की 7.7 करोड़ टन एलएनजी क्षमता के जरिए कतर दुनिया की लगभग 19 प्रतिशत गैस जरूरत पूरी करता है।
ईरान का बाइपास प्रयास
ईरान ने भी गोरेह से जास्क तक लगभग 1000 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन तैयार की है, जिसकी क्षमता रोजाना 10 लाख बैरल है। हालांकि प्रतिबंधों के कारण इसका सीमित उपयोग ही हो पा रहा है।
अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार 2024 में इससे केवल 70 हजार बैरल प्रतिदिन तेल की आपूर्ति हुई। बाद में सितंबर में इसे बंद कर दिया गया। शिपिंग डेटा फर्म केप्लर के अनुसार जास्क से अब तक केवल एक टैंकर ही लगभग 20 लाख बैरल तेल लेकर निकला है।
