खालिस्तान इतिहास, वर्तमान और भविष्य

खालिस्तान; इतिहास, वर्तमान और भविष्य

REPUBLIC SAMACHAR – Samarth Singh II खालिस्तान आंदोलन एक अलगाववादी आंदोलन है जो पंजाब क्षेत्र में खालिस्तान नामक एक संप्रभु राज्य की स्थापना करके सिखों के लिए एक अलग देश बनाने की मांग करता है। प्रस्तावित राज्य में वह क्षेत्र शामिल होगा जो वर्ष 1966 से पहले भारत के पूर्वी पंजाब और आज़ादी से पहले पाकिस्तान के लाहौर तक मौजूद था।

खालिस्तान का इतिहास

एक अलग सिख राज्य का आह्वान ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के समय शुरू हुआ था।
1940 में खालिस्तान का पहला आह्वान “खालिस्तान” नामक एक पर्चे में किया गया था। सिख प्रवासियों की वित्तीय मदद और राजनीतिक समर्थन के साथ, यह आंदोलन भारतीय राज्य पंजाब में पनपा।

1950 के दशक के उत्तरार्ध में सिख नेताओं ने महसूस किया कि पाकिस्तान में मुसलमानों और भारत में हिंदुओं का प्रभुत्व आसन्न था। पंजाब के भीतर एक अलग सिख राज्य को सही ठहराने के लिए, सिख नेताओं ने टिप्पणियों और संकेतों को यह तर्क देने के लिए जुटाना शुरू कर दिया कि पंजाब सिखों का था और सिख पंजाब के हैं। इससे सिख समुदाय का क्षेत्रीयकरण शुरू हुआ।

भारत की 1947 की स्वतंत्रता के बाद, अकाली दल के नेतृत्व में पंजाबी सूबा आंदोलन ने पंजाबी लोगों के लिए एक प्रांत बनाने की मांग की। अकाली दल की मांग की अधिकतम स्थिति खालिस्तान का एक संप्रभु राज्य था, जबकि इसकी न्यूनतम मांग भारत के भीतर एक स्वायत्त राज्य की थी।

भारत की अखंडता को बचाने के लिए, खालिस्तान की माँग को खारिज़ कर दिया गया, परिणाम स्वरुप 60 व 70 की दशक में पंजाब में धार्मिक हिंसा चरम पर पहुँच गई।

वर्ष 1982 में खालिस्तानी नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले ने अकाली दल से हाथ मिला लिया और धर्म युद्ध मोर्चा की स्थापना करी, हज़ारों लोगों इस आन्दोलन में शामिल हुए और अलगावाद की आग पंजाब के हिस्सों में धधकने लगी।

ऑपरेशन ब्लू स्टार

80 के दशक में खालिस्तानी लड़ाकों ने पंजाब में कहर बरसा दिया, 1983 में भिंडरावाले ने हरमिंदर साहिब (स्वर्ण मंदिर) में पनाह ली और उसे छावनी में तब्दील कर दिया, खालिस्तानी लड़ाकों ने भिंडरावाले के आदेशों पर पंजाब में 100 से अधिक लोगों को मार डाला, ऑपरेशन ब्लू स्टार एक भारतीय सैन्य अभियान था, जिसका आदेश प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी ने 1 से 8 जून 1984 के बीच हरमंदिर साहिब परिसर की इमारतों से उग्रवादी धार्मिक नेता जरनैल सिंह भिंडरावाले और उनके सशस्त्र अनुयायियों को हटाने के लिए दिया था।

आदेशों का पालन करते हुए सेना, केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल और पंजाब पुलिस के साथ, लेफ्टिनेंट जनरल कुलदीप सिंह बरार के नेतृत्व में सेना की इकाइयों ने 3 जून 1984 को मंदिर परिसर को घेर लिया। सेना ने खालिस्तानी आतंकवादियों को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा लेकिन उनके इनकार के बाद सेना ने स्वर्ण मंदिर पर हमला शुरू कर दिया। टैंकों और भारी तोपखाने से लैस सेना ने खालिस्तानी आतंकवादियों की मारक क्षमता को बहुत कम आंका था, जिन्होंने भारी किलेबंद अकाल तख्त से एंटी टैंक और मशीन गन से हमला किया, और जिनके पास कवच भेदी क्षमताओं के साथ चीन निर्मित, रॉकेट चालित ग्रेनेड लॉन्चर थे। 24 घंटे की गोलीबारी के बाद, सेना ने आखिरकार मंदिर परिसर का नियंत्रण हासिल कर लिया।

परिणाम-

इस ऑपरेशन में भिंडरावाले मारा गया, जबकि उसके कई अनुयायी भागने में कामयाब रहे। सेना के हताहतों की संख्या में 83 लोगों की मौत और 249 घायलों की गणना की गई। हालांकि राजीव गांधी ने बाद में स्वीकार किया कि 700 से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए थे। भारत सरकार द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक अनुमान के अनुसार, इस घटना के परिणामस्वरूप कुल 493 आतंकवादी और नागरिक हताहत हुए, साथ ही 1592 व्यक्तियों की गिरफ्तारी हुई।

ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेने के लिए चरमपंथियों ने साल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या कर दी, इस घटना का नतीजा 1984 के सिख विरोधी दंगों के रूप में सामने आया जिसमें हजारों निर्दोष सिख मारे गए थे।

खालिस्तान का वर्तमान

हाल ही में हुए किसान आंदोलन में खालिस्तानी आंदोलनों में वृद्धि हुई, इन गतिविधियों में पंजाब चुनाव के बाद तेजी देखी गई जब आम आदमी पार्टी सत्ता में आई।

अमृतपाल सिंह ने अपने संगठन वारिस पंजाब दे के साथ पंजाब में खुलेआम अराजकता फैलाई और खालिस्तान का प्रचार किया। उसने गृह मंत्री अमित शाह को जान से मारने की धमकी भी दी थी।

खालिस्तानी उग्रवादियों को रोकने में आप सरकार नाकाम होते दिखी, केंद्र के दबाव के बाद पंजाब सरकार ने वारिस पंजाब दे के खिलाफ ऑपरेशन किया और अमृतपाल के करीबियों को गिरफ्तार किया, हालांकि अमृतपाल सिंह अभी तक फरार है।

खालिस्तान का भविष्य

प्रशासन की कड़ी कार्यवाही के बावजूद, अलगावाद का संकट कम होते नहीं दिख रहा है, विदेश में भी खालिस्तानी गतिविधियां तेज़ी से बढ़ रही हैं जो की भारत के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।

अमृतपाल सिंह और उसके संगठन वारिस पंजाब दे पर अगर अंकुश नहीं लगाया गया तो देश में फिर से 80 के दशक जैसे हालत हो सकते हैं हालांकि इसकी सम्भावना बहुत कम है।

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