नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : बांबे हाई कोर्ट ने 2006 के मालेगांव बम धमाकों के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए उसे कड़ी फटकार लगाई है।
अदालत ने कहा कि एनआईए ने मामले की पूर्व की जांच एजेंसियों (एटीएस और सीबीआई) द्वारा जुटाए गए महत्वपूर्ण तथ्यों और सुबूतों की पूरी तरह अनदेखी की।
इस मामले में मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और जस्टिस श्याम चांडक की खंडपीठ ने अंतिम चार आरोपितों को सभी आरोपों से मुक्त करते हुए बरी कर दिया है।
अदालत ने अपने विस्तृत आदेश में टिप्पणी की है कि एनआइए ने जांच का जिम्मा संभालने के बाद नए सिरे से ठोस साक्ष्य जुटाने के बजाय केवल सुनी-सुनाई बातों और बाद में वापस लिए गए बयानों पर भरोसा किया।
हाई कोर्ट ने इसे एक ‘रहस्य’ बताया कि एनआईए ने एटीएस और सीबीआइ द्वारा पेश की गई ‘थ्योरी’ और सुबूतों की अनदेखी क्यों की
हाई कोर्ट ने इसे एक ‘रहस्य’ बताया कि एनआईए ने एटीएस और सीबीआइ द्वारा पेश की गई ‘थ्योरी’ और सुबूतों की अनदेखी क्यों की। खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि दो अलग-अलग एजेंसियों द्वारा पेश की गई एक-दूसरे की विपरीत कहानियों के कारण यह मामला अब ‘डेड एंड’ (बंद गली) पर पहुंच गया है, जहां 37 लोगों की जान लेने वाले दोषियों का पता लगाना अब लगभग असंभव हो गया है।
हाई कोर्ट ने इस मामले के चारों आरोपितों-राजेंद्र चौधरी, धन सिंह, मनोहर राम सिंह नरवारिया और लोकेश शर्मा को इस आधार पर बरी कर दिया है कि उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सुबूत नहीं थे।
चारों पर हत्या और आपराधिक साजिश के साथ भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए थे
चारों पर हत्या और आपराधिक साजिश के साथ भारतीय दंड संहिता और गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए थे। हाई कोर्ट ने सितंबर 2025 के विशेष न्यायालय के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें चारों आरोपितों के खिलाफ आरोप तय किए गए थे।
बता दें कि आठ सितंबर, 2006 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव कस्बे में चार बम विस्फोट हुए थे, जिनमें से तीन शुक्रवार की नमाज के तुरंत बाद हमीदिया मस्जिद और बड़ा कब्रिस्तान परिसर के अंदर हुए। चौथा विस्फोट मुशावरत चौक पर हुआ।
