भारत में कितना सफल है नारी सशक्तिकरण?

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Republic Samachar- Samarth Singh II भारत में नारी सशक्तिकरण की मांग लंबे समय से बनी हुई थी, क्योंकि महिलाओं को हमेशा हमारे समाज में उत्पीड़न का विषय बनाया गया था। उनके अधिकार और स्वतंत्रता सीमित थी, उनकी आवाजें अनसुनी थीं, उनकी जरूरतों को नजरअंदाज किया गया था और समाज निर्माण में भूमिका की हमेशा उपेक्षा की गई थी।

यहाँ तक कि उनकी बुनियादी जरूरतें जैसे शिक्षा, रोजगार, स्वच्छता आदि भी उनसे छीन ली गईं। यही कारण है कि हमारे समाज को संतुलित होने के लिए किसी भी कीमत पर महिलाओं को सशक्त बनाने की आवश्यकता थी।

नारी सशक्तिकरण की शुरुआत

भारत में नारी सशक्तिकरण का शुरुआत 1952 में हुई, जब लोक सभा चुनाव में महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिया गया और यह कदम भारत में समानता के बीज बोने में काफी कारगर साबित हुआ। इसके बाद हमारे राष्ट्र में महिलाओं की स्थिति में सुधार के लिए कई और योजनाएं शुरू की गईं।

1950 के दशक के बाद से सभी “पंचवर्षिया योजनाओं” (अब नीति आयोग) में महिलाओं की जरूरतों पर विशेष ध्यान दिया गया। इन योजनाओं ने धीरे-धीरे सकारात्मकता का एक खुला माहौल बनाया, जिसने महिलाओं को उस स्थिति पर खड़े होने में मदद की जहां वह आज खड़ी हैं।

सशक्तिकरण के लिए सरकारी योजनाएं

आजादी के बाद से महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकार द्वारा कई योजनाएं शुरू की गई थीं, लेकिन आज हम उन योजनाओं को देखेंगे जो हाल ही में शुरू की गई हैं, जैसे कि बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ, उज्ज्वला योजना आदि।

बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ योजना: इस योजना को वर्ष 2015 में भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया था। यह योजना भारत में महिलाओं के घटते लिंग अनुपात के मुद्दे को संबोधित करने के लिए लाई गई थी, और इसका मुख्य उद्देश्य भारत में बालिका शिक्षा को बढ़ावा देना था। इस योजना की दुनिया भर में प्रशंसा हुई और साक्षी मलिक (2016 ओलंपिक में कांस्य पदक विजेता) को इस योजना का ब्रांड एंबेसडर बनाया गया।

इस योजना की प्रभावशीलता:

भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के आंकड़ों के अनुसार यह योजना अपने उद्देश्यों को पूरा करने में विफल रही। कैग के आंकड़ों के अनुसार, हरियाणा और पंजाब के कई जिलों में महिलाओं के लिंगानुपात में गिरावट आई। मानव संसाधन विकास की स्थायी समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष निकला कि वित्तीय वर्ष 2016 – 2017 में योजना के लिए कुल चालीस करोड़ रुपये में से केवल पांच करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।

उज्जावला योजना:
यह योजना भारत सरकार द्वारा वर्ष 2016 में यौन शोषण के लिए महिलाओं और बच्चों की तस्करी को रोकने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, यह योजना यौन शोषण के पीड़ितों के पुनर्वास के लिए भी काम करती है।

इस योजना की प्रभावशीलता –

यह योजना महिला तस्करी के कई मामलों को रोकने में सफल साबित हुई, और कई महिलाओं के पुनर्वास में भी मदद की।इस योजना ने उन महिलाओं के प्रती भेदभाव की प्रथा को समाप्त करने के लिए अभियान भी चलाए जो किसी भी यौन उत्पीड़न से पीड़ित थीं। इससे पहले वह महिलाएं जोकि किसी भी दुर्व्यवहार का शिकार होती थीं, उन्हें परिवार पर बोझ माना जाता था और अपमान की नजरों से देखा जाता था। इस योजना के आने के बाद इस परंपरा में गिरावट आई है।

महिला हेल्पलाइन, महिला केंद्र और स्वाधार गृह

अन्य योजनाओं के विपरीत इन्हें सबसे प्रभावी कहा जा सकता है। महिला हेल्पलाइनों का नेटवर्क बहुत व्यापक और मजबूत है, वे जरूरतमंद महिलाओं की मदद के लिए 24/7 काम करते हैं। इस तरह की योजनाओं की उपस्थिति के कारण कई महिलाएं कार्यस्थल पर और रात में अकेले बाहर जाने के दौरान खुदको सुरक्षित महसूस करती हैं।

स्वाधार गृह एक योजना है जो कठिन परिस्थितियों में महिलाओं को आश्रय, धन, भोजन, दवाएं और सुरक्षा प्रदान करके उनकी मदद करती है। यह वन स्टॉप सेंटर योजना के समान है, जो महिलाओं के हित के लिए काम करती है। यह योजना कुशलता से काम कर रही है और भविष्य में बहुत बढ़ सकती है।

इन योजनाओं के परिणाम

भारत में महिला सशक्तिकरण लाने के लिए सैकड़ों कदम उठाए जाते हैं, हजारों अभियान चलाए जाते हैं। हालांकि वह बहुत सारी महिलाओं की मदद करते हैं लेकिन फिर भी कई महिलाएं उनसे अछूती रह जाती हैं। ग्रामीण महिलाएं इन योजनाओं से सबसे अधिक अप्रभावित रहती हैं, और उनकी जीवन की समस्याएं भी अनसुलझी रहती  हैं।

आज महिलाओं के पास अच्छी शिक्षा प्राप्त करने, अपना मनचाहा करियर चुनने, नौकरियों में देर रात तक काम करने आदि का अवसर है। लेकिन समाज के एक बड़े वर्ग की विचारधारा अभी भी महिलाओं की स्वतंत्रता के तथ्य को स्वीकार नहीं कर पाती है और यहीं सभी चीजें खराब हो जाती हैं।

लेकिन सकारात्मक पक्ष यह है कि समाज आगे बढ़ कर रहा है, अच्छी शिक्षा लोगों में समानता के बारे में जागरूकता बढ़ा रही है और एक दिन सब कुछ सामान्य हो सकता है, और केवल तभी इन योजनाओं को प्रभावी कहा जाएगा।

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